ज्ञानार्जन से जीविकोपार्जन

ज्ञान का मार्ग सदा ही सफलता की कुंजी है | इस पथ पर चलने वाले को भले ही कभी ठोकर खानी पड़े, परन्तु कभी हार का सामना नहीं करना पड़ता | इसको ही मूल मंत्र बनाकर महज 25 साल के बिरेन्द्र महतो ने अपना मार्ग खेती की ओर प्रशस्त किया है | स्थानीय संस्थान से आई.टी.आई. की डिग्री प्राप्त कर , नौकरी न करके कृषि की ओर उन्मुख हो कर , इसे ही अपनी जीविकोपार्जन का जरिया बनाया है |

ये अनगडा प्रखंड रांची, पंचायत जसपुर के निवासी हैं | अपनी पढ़ाई पूरी करने के पश्चात भी कभी कृषि जैसे नेक कार्य का साथ नहीं छोड़ा,  आज अपने गाँव के युवाओं के लिए प्रेरणा के श्रोत बन गए हैं | खेती के दृढसंकल्प को सुचारू रखते हुए, अपनी आठ एकड़ की ज़मीन पर जैविक तथा सतत सम्मिलित कृषि पद्धति को अपनाकर अपनी खेती को सुदृढ़ बनाने का अद्भुत उदाहरण पेश किया है | यह किसी भी प्रकार का रासायनिक खाद का प्रयोग नहीं करते तथा स्वयं बनाये हुए केंचुअखाद, मटका खाद, औषधीय मटका खाद तथा विभिन्न प्रकार की जैविक दवाओं क इस्तेमाल करते हैं |

आज इनके खेत में 17 प्रकार की सब्जियों का सुनियोजन देखा जा सकता है, जो की सतत सम्मिलित कृषि पद्धति का उदाहरण है | सतत सम्मिलित कृषि अर्थात् अपनी कृषि-पारिस्थितिकी को मद्दे नज़र रखते हुए, अपनी कृषि उप्तंत्रों के समन्वय द्वारा कृषि को चिरंतर बनाना | यह मिश्रित कृषि, रिले कृषि, बहुतलीय कृषि , जैविक कृषि इत्यादि द्वारा संभव है, जिसे बिरेन्द्र की कृषि पद्धति में आसानी से देखा जा सकता है | खेत के किनारों का तथा उपयुक्त जगहों का यथासंभव सदुपयोग द्वारा एक साथ अनेक फसलों की खेती की जा सकती है | इस क्रिया से किसानों पर एक फसल के नष्ट या ख़राब हो जाने से भी अतिरिक्त फसल से अपनी आय पर किसी भी प्रकार की समस्या को रोक सकने मे सहायक होता है | यह एक किसान तथा उसके परिवार की प्रतिदिन खाद्यान्न तथा पोषक आहार की पूर्ति करने में अत्यंत सहायक होता है |

खाद्य सुरक्षा के नज़रिए से भी यह कृषि पद्धति बहुत ही फायदेमंद है | इस कृषि पद्धति को अपनाने से न केवल खेती के खर्चे मे कमी आती है, अपितु मृदा के स्वास्थ्य मे भी वृद्धि होती है, मिटटी में जीवाणु तथा नेत्रजन की सही मात्रा में बढ़ोतरी होती है | अपने खाद्य को विषमुक्त रखने का यह एक बहुत ही भरोसेमंद जरिया है | इस कृषि पद्धति को अपनाकर बिरेन्द्र ने एक जिम्मेदार नागरिक होने का भी परिचय दिया है  और इस मार्ग पर उनका साथ दिया है “परती भूमि विकास समिति” ने |

“परती भूमि विकास समिति से जैविक, श्री-विधि से धान की खेती तथा सतत सम्मिलित कृषि पद्धति की प्रशिक्षण लेने के बाद मैंने तय कर लिया की मुझे जैविक अपनाना है तथा अपनी कृषि को विषमुक्त बनाना है ” – बिरेन्द्र महतो ने यह कहते हुए बताया की आज के समय में वो साप्ताहिक 70 किलो टमाटर और 2 क्विंटल आलू गेतलसूद मंडी में बेच रहे हैं | यह हमारे किसान भाइयों के लिए प्रेरणा के श्रोत हैं |

बिरेन्द्र महतो ने परती भूमि विकास समिति, रांची द्वारा चलाये जा रहे “ग्रीन कॉलेज” प्रोजेक्ट के अंतर्गत जैविक खेती तथा सतत सम्मिलित कृषि पद्धति का प्रशिक्षण प्राप्त किया है |

By: Pooja Sharma, Course Coordinator, Green College, Society for Promotion of Wastelands Development

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